(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.251. अध्यायः 251
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
कर्णेन बहुधा प्रार्थनेपि दुर्योधनेन प्रायोपवेशाध्यवसायादपरावर्तनम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

कर्ण उवाच। 3-251-0x(2616)(25659)
राजन्नद्यावगच्छामि तवैव लघुसत्वताम्।
`अल्पत्वं च तथा बुद्धेः कार्याणामविवेकिताम्' ॥ 3-251-1(25660)
किमत्र चित्रं धर्मज्ञ मोक्षितः पाण्डवैरसि।
सद्यो वशं समापन्नः शत्रूणां शत्रुकर्शन ॥ 3-251-2(25661)
सेनाजीवैश्च कौरव्य तथा विषयवासिभिः।
अज्ञातैर्यदि वा ज्ञातैः कर्तव्यं नृपतेः प्रियम् ॥ 3-251-3(25662)
प्रायः प्रधानाः पुरुषाः क्षोभयित्वाऽरिवाहिनीम्।
निगृह्यन्ते चयुद्धेषु मोक्ष्यन्ते च स्वसैनिकैः ॥ 3-251-4(25663)
सेनाजीवाश्च ये राज्ञां विषये सन्ति मानवाः।
तैः संगम्य नृपार्थाय यतितव्यं यथातथम् ॥ 3-251-5(25664)
यद्येवं पाण्डवै राजन्भवद्विषयवासिभिः।
यदृच्छया मोक्षितोऽसि कतत्रका परिदेवना ॥ 3-251-6(25665)
न चैतत्साधु यद्राजन्पाण्डवास्त्वां नृपोत्तमम्।
स्वसेनया संप्रयान्तं नानुयान्ति स्म पृष्ठतः ॥ 3-251-7(25666)
शूराश्च बलवन्तश्च संयुगेष्वपलायिनः।
भवतस्ते सभायां वै प्रेष्यतां पूर्वमागताः ॥ 3-251-8(25667)
पाण्डवेयानि रत्नानि त्वमद्याप्युपभुञ्जसे।
सत्वस्थान्पाण्डवान्पश्य न ते प्रायमुपाविशन् ॥ 3-251-9(25668)
`तदलं ते महाबाहो विषादं कर्तुमीदृशम्'।
उत्तिष्ठ रराजन्भद्रं ते न चिन्तां कर्तुमर्हसि ॥ 3-251-10(25669)
अवश्यमेव नृपते राज्ञो विषयवासिभिः।
प्रियाण्याचरितव्यानि तत्र का परिदेवना ॥ 3-251-11(25670)
मद्वाक्यमेतद्राजेन्द्र यद्येवं न करिष्यसि।
स्थास्यामीह भवत्पादौ शुश्रूषन्नरिमर्दन ॥ 3-251-12(25671)
नोत्सहे जीवितुमहं त्वद्विहीनो नरर्षभः।
प्रायोपविष्टस्तु तथा राज्ञां हास्यो भविष्यसि ॥ 3-251-13(25672)
वैशंबायन उवाच। 3-251-14x(2617)
एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा।
नैवोत्थातुं मनश्चक्रे स्वर्गाय कृतनिश्चयः ॥ 3-251-14(25673)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि घोषयात्रापर्वणि एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-251-8 भवतस्ते सहाया वै इति झ. पाठः ॥


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